मंगल स्तुति

 

मंगल स्तुति

मंगलाचरण गुरुस्तुति
ब्रह्मरूप आनंदघन, निर्विकार निर्लेव ।
मंगलकरण दयालजी, तारण गुरु शुकदेव ॥
सतियन में तुम सत्य हो, शूरण में हो वीर ।
यतियन में तुम यती हो, श्री शुकदेव गंभीर ॥
पतित उधारण तुम लखे, धरम चलावन भेव ।
संकट सकल निवारिये, जै जै श्री शुकदेव ॥
चिंता मेटन भयहरण, दूरि करण जग व्याध ।
गुरु शुकदेव कृपा करो, चरण लगे सब साध ॥
दाता चारों भेद के, श्री शुकदेव दयाल ।
"चरणदास" पर हूजिये, बारम्बार कृपाल ॥

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श्री शुकदेव जी महाराज का अष्टक
षोडश वर्ष किशोर मूरति, श्याम वरण दिगम्बरं ।
घूंघर वाले केश झलके, (श्री) शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
पदम आसन उदर त्रिवली, चरण पंकज शोभितम ।
आजानुभुज मुस्कात मुखसो, श्री शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
गुढ़जत्रु विशाल उर छवि, नाभि गंभीर विराजितं ।
जलज लोचन सुखद नासा, (श्री) शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
श्री व्यासनंदन जगत वंदन, मोह ममत्व निकन्दनं ।
काम क्रोध मद लोभ न जिनमे, (श्री) शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
ब्रह्मरूप अनूप मुनिवर, पराशर कुलभूषणम ।
श्री कृष्ण चरित पुनीत वरनत, (श्री) शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
त्रिभुवन उजागर कृपासागर, द्वन्द संकट मोचनम ।
प्रेम मद माते रहे नित, (श्री) शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
निरालम्ब निहभर्म निशिदिन, स्थिर बुद्धि निकेतनम ।
धर्मधारी ब्रह्मचारी, (श्री) शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
पतितपावन भर्म नशावन, शरणागत सुखदायकं ।
मायाजीतं गुनातीतं, (श्री) शुक्मुनि चरण प्रणाम्यहं ॥
श्री सुखदेव अष्टक परम सुन्दर, पठत पाप नशायकं ।
"चरणदास" शुकदेव स्वामी, भक्ति मुक्ति फलदायकम ॥
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